चमकती सी थाली

चाँद कभी चमकती थाली तो कभी चांदी की गेंद तो कभी बस यूँ ही भटकता सा कोई मुसाफिर अकेले विशाल गगन में कितना कुछ अनुभव कराता है ये मुझे।

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पज़ल ज़िन्दगी