आशाओं का स्पर्श  

नहीं छोड़ा है हाथ मेरा हमेशा से ही साथ रही हैं  

उठते, बैठते , सोते जागते , आशाएं दिन ,रात रहीं हैं  

कभी चिड़ियों की चहचहाहट सा मेरे कानो में गुनगुनाया है  

कभी माँ की मधुर लोरी सा  मुझे रातों में सुलाया है 

कभी पिता की दबंग  आवाज़ सा मुझ सोते को जगाया है  

आसपास रही हैं , बहुत ख़ास रही हैं, मेरा विशवास रही हैं  

आशाओं की ऊँगली पकड़ कर सारी उम्र ही चली हूँ मैं  

आशाओं के आँचल में खुल कर बहुत मचली हूँ मैं   

अनगिनत अवसरों पर आशाओं ने मुझ रोती को हंसाया है  

संग ले चल मुझे ले उड़ीं गगन में, उनका साथ मुझे भाया है  

ना जाने क्यों मुझे लगता है , आशाएं हैं तो जीवन भी है  

आशाओं के भरोसे चलने का , इस दुनिया में चलन भी है  

अपने मन की अलमारी खोल लूँ तो आशाओं का वहां खजाना है  

जो बड़ा ही अजीबोगरीब, आड़ा टेढ़ा, गंभीर भी और बचकाना है  

हर तरह की आशाएं पनपती और फलती फूलती हैं यहाँ  

मेरे उधड़े सपनो की चादर को सिलती सी मिलती हैं यहाँ  

कभी मिली अगर आशाओं से तो पूछूँगी बस यही  एक बात  

मेरी साँसों की तरह क्यों रहीं वो जुडी मेरे जीवन के साथ?  

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