धरा की परम्परा
सुनो पृथ्वी , जैसे मनुष्यों ने परम्पराएं बनायीं हैं
क्या है तुम्हारी भी कोई परंपरा ?
हे जीवनदायिनी, करुणामयी, वसुंधरा
मानव को आश्रय तो दे दिया तुमने
पर क्या इसका कोई श्रेय भी लिया तुमने?
सूर्य देवता से पर्याप्त दूरी भी बनाई रखी
निरंतरता के लिए अपनी धूरि भी बनाई रखी
पनपने दिया अपने वक्षस्थल पर मानव जीवन को
कभी रोका नहीं तुमने इस प्राकृतिक सृजन को
मानव के लिए क्या कोई परंपरा निश्चित की?
अपने मूल्यों, उद्देश्यों की भाषा अंकित की?
मानव ने तो अपनी असंख्य परम्पराएं बना डालीं
रीति, प्रथाएं, धर्म, भाषाएं बना डालीं
बाँट डाला तुमको महाद्वीपों, राष्ट्रों,जातियोंं, प्रजातियों में
जैसा चाहा वैसी परम्पराओं भांति भाँतियों में
पर तुम्हारी परम्परा पृथ्वी तो निरंतर चलने की रही
इस अनादि, असीम ब्रह्माण्ड में पलने की रही
जीवन को जीवित रखने के लिए पृथ्वी तुमने
वायु, जल, थल से करी दोस्ती तुमने
हर जीवन को पनपने दिया स्वतंत्र होकर
इसी परंपरा को जीवित रखा यन्त्र,तंत्र होकर
परिवर्तन भी रही परंपरा तुम्हारी हरदम
नयी ऋतुएं,नयी फसलें और अपार जन जीवन
तो ये मनुष्य क्यों इतना स्वार्थी और विध्वंसी सा रहा ?
लोभी, क्रूर , निरंतर प्रतिस्पर्धी सा रहा ?
क्यों नहीं वो सीख सका कुछ धरा की परम्परा से ?
त्याग और निरंतरता इस स्नेहमयी वसुंधरा से?